भारत में 6 लाख डॉक्टरों की कमी, चुनौतियों के बीच निकलेगी सेहत

 

भारत में 6 लाख डॉक्टरों की कमी, चुनौतियों के बीच निकलेगी सेहत

भारत के विकास के लिए हमारे पास युवा ऊर्जा का भंडार है, लेकिन उससे ज्यादा हमें बेहतर स्वास्थ्य की दरकार है। एक स्वस्थ समाज ही बेहतर राष्ट्र का निर्माण कर सकता है। इसलिए हमें अपनी स्वास्थ्य सेवाओं पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। वो भी ऐसे वक्त में जब प्रदूषण जनित रोगों में इजाफा हो रहा है और हमारा जीवन जीने का तरीका ही रोगों को दावत दे रहा है। उस पर डॉक्टर और नर्सों की कमी के चलते बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाने में भी हम पूरी तरह से सफल नहीं हो रहे हैं।

फिर भी यह साल संकल्प का साल है, जिससे हम अपने स्वास्थ्य को बेहतर बना सकते हैं। केंद्र सरकार ने आयुष्मान भारत के साथ देश की आधी से ज्यादा आबादी को स्वास्थ्य की गारंटी दे दी है। साथ ही ऐसा बहुत कुछ है जो इस साल को इस क्षेत्र के लिए उम्मीदों से भरा साल बना रहा है।

उद्यम से सेहत संवारती विभूतियां

स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने की दिशा में निजी क्षेत्र अहम भूमिका निभा रहा है। बहुत से अस्पताल मरीजों को विश्वस्तरीय सुविधाएं उपलब्ध कराने में जुटे हैं। सरकारीनिजी साझेदारी ने निश्चित रूप से लोगों को सेहतमंद बनाने की दिशा में काम किया है। इस मुहिम में कुछ विभूतियों ने अहम भूमिका निभाई और सामाजिक उद्यमशीलता का अभूतपूर्व उदाहरण पेश किया। उन्होंने लोगों की सेहत को सबसे ऊपर रखा और बिना मुनाफा कमाए ऐसा बिजनेस मॉडल विकसित किया, जिससे उनकी लागत भी निकलती रहे और गरीबों और दुखियों का कल्याण भी होता रहे।

मेडिसिन बाबा

ब्लड बैंक के पूर्व तकनीशियन 79 वर्षीय ओंकार नाथ पिछले आठ वर्र्षों से लोगों से दवाएं इकट्ठा करते हैं और गरीबों में बांट देते हैं। इसके लिए वह रोजाना 7 किमी पैदल चलते हैं और घर-घर जाकर दवाएं जमा करते हैं। ये वो दवाएं हैं जिनकी लोगों को जरूरत नहीं होती और वे अमूमन उन्हें फेंक देते हैं। दवाएं एक्सपायरी डेट की ना हों, वह इसकी जांच करने के बाद ही उन्हें लेते हैं। दिल्ली में एक किराए के कमरे में उन्होंने अपना छोटा सा मेडिकल स्टोर बना रखा है। उनके यहां सर्दी, बुखार, के अलावा कैंसर, डायबिटीज जैसी गंभीर बीमारियों के लिए भी दवाएं मौजूद होती हैं। इन्हें वे डॉक्टरों के परामर्श पर गरीबों को देते हैं।

MR राजगोपाल

तिरुवनंतपुरम मेडिकल कॉलेज के पूर्व डॉक्टर एमआर राजगोपाल ने 2003 में गैर-सरकारी संगठन पैलियम इंडिया की शुरुआत की। यह संस्था ऐसे लोगों का शारीरिक और मानसिक दर्द दूर करती है, जो गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं और जिनके बचने की कोई उम्मीद नहीं है। इसे पैलेटिव केयर कहते हैं। बीमारी के चलते होने वाला असहनीय दर्द दूर करने के लिए उन्हें मॉर्फिन का इंजेक्शन दिया जाता है। नर्व ब्लॉक तकनीक से दर्द वाली नस को बाधित किया जाता है।

बिंदेश्वर पाठक

भारतीय समाजशास्त्री बिंदेश्वर पाठक ने देश के स्वास्थ्य-स्वच्छता के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव किए। उन्होंने 1970 में बिहार से टू पिट पोर फ्लश टायलेट की शुरुआत की। यह एक ऐसा टायलेट था जिसमें पानी का इस्तेमाल होता है और दो गड्ढों के जरिए गंदगी खुद ब खुद खत्म हो जाती थी। इसमें मैला ढोने की जरूरत नहीं पड़ती थी। इसे सुलभ शौचालय के नाम से जाना जाता है। इसी तकनीक के आधार पर सार्वजनिक स्थलों पर सुलभ शौचालय विकसित किए गए। इससे लोगों का स्वास्थ सळ्धारने के साथ गंदगी और जल प्रदूषण रोकने में भी मदद मिली।

डॉ चारुदत्त

देश के नामी न्यूरोसर्जन और अभिनेत्री राधिका आप्टे के पिता डॉ चारुदत्त आप्टे ने 2003 में संवेदना नाम की संस्था की शुरुआत की। यह संस्था मुफ्त में गरीबों की सर्जरी करवाती है। शुरुआत में यह केवल न्यूरो सर्जरी की सुविधा उपलब्ध कराती थी। हालांकि अब यह तकरीबन हर बीमारी के लिए सर्जरी करती है। संस्था के पास सर्जन की पूरी टीम है जो मुफ्त में काम करती है। लोगों से हॉस्पिटल चार्ज के तौर पर केवल 30 फीसद राशि ली जाती है।

आयुष्मान भारत योजना

केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना के तहत केंद्र का लक्ष्य देश के 10 करोड़ परिवारों या 50 करोड़ लोगों को सालाना 5 लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध कराना है। इसके अंतर्गत आने वाले व्यक्ति का बिना पैसे दिए कैशलेस इलाज हो सकेगा।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन

इसके अंतर्गत दो कार्यक्रम राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) और राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन (एनयूएचएम) आते हैं। हालांकि सार्वजनिक स्वास्थ्य में मानव संसाधन की कमी से जूझ रहा है, बावजूद इसके प्रयास बेहतर परिणाम दे रहे हैं।

अंशु गप्ता

1999 में नौकरी छोड़ गूंज संस्था की शुरुआत की। यह संस्था ग्रामीण इलाकों से कपड़ों को इकट्ठा करती है। इन कपड़ों से ग्रामीण इलाके की औरतों के लिए सस्ते सेनेटरी नैपकिन तैयार किए जाते हैं। उनकी इस पहल ने ग्रामीण महिलाओं की सेहत सुधारने में बड़ी भूमिका निभाई है।

डॉ वसन

दवा कंपनी एस्ट्राजेनेका के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ वसन के संबंधमूर्ति ने ऐसी दवा विकसित की जिसकी मदद से एक ही डोज में मलेरिया का इलाज संभव है। यह दवा मलेरिया के परजीवी द्वारा छोड़े जाने वाले प्रोटीन पर वार करती है। बाजार में अब तक जो दवाएं मौजूद थीं वे इस प्रोटीन पर वार नहीं करती थीं। चूहों और गिनी पिग पर हुए टॉक्सिसिटी टेस्ट बताते हैं कि यह दवा मलेरिया की अन्य दवाओं से ज्यादा सुरक्षित है।

 

बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम

इस कार्यक्रम का सबसे बड़ा योगदान शिशु मृत्यु दर में कमी आना है। जहां 2005 में शिशु मृत्यु दर प्रति एक हजार 58 थी, वहीं 2014 में यह घटकर 39 हो गई है। 2017 में यह 33 रह गई। नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य के लिए विशेष इकाइयां बनाई गई हैं। स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने वालों की क्षमताओं को बढ़ाया गया है। साथ ही टीकाकरण कार्यक्रम भी बड़े पैमाने पर चलाया जा रहा है।

रोग नियंत्रण कार्यक्रम

एनएचएम के अंतर्गत क्षय नियंत्रण, अंध नियंत्रण, राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम, कुष्ठ उन्मूलन सहित कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम में मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया सहित छह रोग शामिल हैं। इन कार्यक्रमों के जरिए काफी सकारात्मक परिणाम आए हैं।

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