अनुच्‍छेद 370 पर पाकिस्‍तान को एक बार फिर बड़ा झटका, भारत को फ‍िर मिला अमेरिका का साथ

 

अनुच्‍छेद 370 पर पाकिस्‍तान को एक बार फिर बड़ा झटका, भारत को फ‍िर मिला अमेरिका का साथ

 

अमेरिका ने एक बार फ‍िर अनुच्‍छेद 370 पर भारत सरकार के रुख का समर्थन किया है। भारत के लिए यह एक बड़ी कूटनीतिक जीत है। वहीं एक बार फ‍िर पाकिस्‍तान हुकूमत को बड़ा झटका लगा है। रिपब्लिकन पार्टी के एक कांग्रेसी नेता ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय संसद की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रावधान के खत्‍म होने से पूरी घाटी में अमन शांति और विकास का मार्ग प्रशस्‍त हुआ है। जम्‍मू-कश्‍मीर के भीतर शांति और विकास के लिए जरूरी हैं।

हाल ही में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में एरिजोना के सीनेटर पॉल ए ग्रोसर ने जम्‍मू कश्‍मीर के भीतर शांति और विकास को सुनिश्चित करने के लिए नरेंद्र माेदी और ट्रंप प्रशासन के संयुक्‍त प्रयासों की सराहना की। उन्‍होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने यह स्‍पष्‍ट कर दिया है कि शांति और आर्थिक समृद्धि को सुविधाजनक बनाने के लिए यह परिवर्तन अनिवार्य था।

उन्‍होंने कहा कि मैं जम्‍मू कश्‍मीर की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए यह एक बड़ा और अहम कदम है। ग्रोसर ने कहा कि राज्‍य के अनुच्‍छेद 370 और राज्‍य के विभाजन के प्रावधानों के दो संघ राज्‍य क्षेत्रों-लद्दाख और जम्‍मू कश्‍मीर में विभाजन का स्‍वागत करते हैं।

प्रमिला जयपाल का आरोप

बता दें कि कश्मीर से प्रतिबंध हटाने के लिए अमेरिकी सांसद प्रमिला जयपाल ने संसद में प्रस्ताव पेश किया था। इस प्रस्ताव का भारतीय मूल के लोग पिछले काफी दिनों से विरोध कर रहे हैं। इतना ही नहीं इस विरोध में भारतीय अमेरिकी का समूह प्रमिला के कार्यालय के बाहर शांतिपूर्ण प्रदर्शन भी कर चुका है। जयपाल ने अपने प्रस्‍ताव में कहा है कि भारत सरकार जितना जल्दी संभव हो हिरासत में लिए गए लोगों को छोड़ दे और कश्‍मीर में संचार व्यवस्था शुरू की जाए। प्रमिला भारत विरोधी लॉबी के हाथों में खेल रही थीं। उन्होंने इस मसले पर भारत सरकार को कठघरे में खड़ा किया था। हालांकि मोदी सरकार ने उनके सभी आरोपों को निराधार बताया था।


क्‍या है अनुच्‍छेद 370

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 370 एक 'अस्‍थायी प्रबंध' के जरिए जम्मू और कश्मीर को एक विशेष स्वायत्ता वाला राज्य का दर्जा देता है। भारतीय संविधान के भाग 21 के तहत जम्मू और कश्मीर को यह अस्थायी, परिवर्ती और विशेष प्रबंध वाले राज्य का दर्जा हासिल होता है।
भारत के सभी राज्यों में लागू होने वाले कानून भी इस राज्य में लागू नहीं होते हैं। मिसाल के तौर पर 1965 तक जम्मू और कश्मीर में राज्यपाल की जगह सदर-ए-रियासत और मुख्यमंत्री की जगह प्रधानमंत्री हुआ करता था

संविधान के अनुच्छेद 370 के प्रावधानों के अनुसार, संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है लेकिन किसी अन्य विषय से संबंधित कानून को लागू कराने के लिए केंद्र को राज्य सरकार का अनुमोदन चाहिए।

जम्मू और कश्मीर के लिए यह प्रबंध शेख अब्दुल्ला ने वर्ष 1947 में किया था। शेख अब्दुल्ला को राज्य का प्रधानमंत्री महाराज हरि सिंह और पंडित जवाहर लाल नेहरू ने नियुक्त किया था। तब शेख अब्दुल्ला ने अनुच्छेद 370 को लेकर यह दलील दी थी कि संविधान में इसका प्रबंध अस्‍थायी रूप में ना किया जाए।
उन्होंने राज्य के लिए कभी न टूटने वाली, 'लोहे की तरह स्वायत्ता' की मांग की थी, जिसे केंद्र ने ठुकरा दिया था।इस आर्टिकल के मुताबिक रक्षा, विदेश से जुड़े मामले, वित्त और संचार को छोड़कर बाकी सभी कानून को लागू करने के लिए केंद्र सरकार को राज्य से मंजूरी लेनी पड़ती है।

राज्य के सभी नागरिक एक अलग कानून के दायरे के अंदर रहते हैं, जिसमें नागरिकता, संपत्ति खरीदने का अधिकार और अन्य मूलभूत अधिकार शामिल हैं। इसी आर्टिकल के कारण देश के दूसरे राज्यों के नागरिक इस राज्य में किसी भी तरीके की संपत्ति नहीं खरीद सकते हैं।

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