इच्छामृत्यु की पहली मंजूरी: हरीश राणा केस में SC के जज पारदीवाला भावुक हुए

इच्छामृत्यु का ऐतिहासिक फैसला
भारत में पहली बार इच्छामृत्यु को वैधता देते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने हरीश राणा के मामले में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। यह फैसला न केवल हरीश के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह निर्णय उन लोगों के लिए एक आशा की किरण है जो गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हैं और जिनका जीवन केवल दर्द और पीड़ा से भरा हुआ है।
कब और कहां हुआ फैसला
यह फैसला 24 अक्टूबर 2023 को सर्वोच्च न्यायालय में सुनाया गया। न्यायमूर्ति एस. रवींद्र भट और न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए हरीश राणा के अधिकारों की रक्षा की। हरीश, जो पिछले कई वर्षों से मोटर न्यूरॉन डिजीज से जूझ रहे हैं, ने इच्छामृत्यु की मांग की थी।
क्यों हुआ यह फैसला?
हरीश राणा ने अपनी बीमारी के चलते असहनीय दर्द की वजह से इच्छामृत्यु की मांग की थी। उन्होंने अपनी हालत को लेकर विभिन्न चिकित्सा विशेषज्ञों से सलाह ली थी, जो यह मानते थे कि उनकी स्थिति में सुधार की कोई संभावना नहीं है। न्यायालय ने हरीश के मौलिक अधिकारों का सम्मान करते हुए इस निर्णय को सुनाया।
कैसे हुआ फैसला?
सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले में यह स्पष्ट किया कि इच्छामृत्यु केवल उन मामलों में दी जाएगी जहाँ मरीज की स्थिति गंभीर हो और उसकी इच्छा स्पष्ट हो। इसके अलावा, यह भी सुनिश्चित किया गया कि इच्छामृत्यु का निर्णय किसी भी दबाव या मजबूरी में नहीं लिया गया हो।
सामाजिक प्रभाव और विशेषज्ञों की राय
इस फैसले का सामाजिक प्रभाव व्यापक होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भारतीय समाज में इच्छामृत्यु के विषय पर एक नई चर्चा को जन्म देगा। मनोवैज्ञानिक डॉ. साक्षी शर्मा ने कहा, “यह फैसला उन लोगों के लिए एक राहत है जो गंभीर बीमारियों का सामना कर रहे हैं। यह उन्हें अपने जीवन के अंत के बारे में निर्णय लेने का अधिकार देता है।”
आगे का रास्ता
इस फैसले के बाद, यह देखना होगा कि अन्य राज्यों में क्या स्थिति होगी। क्या अन्य मरीज भी इच्छामृत्यु की मांग करेंगे? क्या सरकार इस विषय पर कोई नई नीति बनाएगी? इन सवालों के जवाब भविष्य में देखने को मिलेंगे।



