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13 साल से जीवित लाश, मां ने हरीश राणा के लिए मांगी थी मौत… अब आया ‘सुप्रीम’ निर्णय

नई दिल्ली: न्यायालयों का कार्य हमेशा से समाज में न केवल कानून का पालन सुनिश्चित करता है, बल्कि मानवता के प्रति न्याय की भावना को भी उजागर करता है। हाल ही में एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया है। यह मामला है हरीश राणा का, जो पिछले 13 वर्षों से एक ‘जिंदा लाश’ के रूप में जीवन जी रहा था। अब, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपना निर्णय सुनाया है।

क्या है पूरा मामला?

हरीश राणा, जो एक भयानक दुर्घटना का शिकार हुआ था, पिछले 13 साल से कोमा में था। यह सब तब शुरू हुआ जब 2010 में एक सड़क दुर्घटना ने उसकी जिंदगी बदल दी। उस समय से, वह न केवल शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से भी एक जिंदा लाश की तरह जी रहा था। उसकी मां ने कई बार न्यायालय से गुहार लगाई कि उसे इस स्थिति से मुक्त किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि यदि किसी व्यक्ति की शारीरिक स्थिति ऐसी हो कि वह सामान्य जीवन जीने में असमर्थ है, तो उसके जीवन को समाप्त करने की अनुमति दी जा सकती है। यह निर्णय मानवता की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उन लोगों के लिए उम्मीद की किरण है जो लंबे समय तक किसी कठिनाई में जीवन जी रहे हैं।

मां की गुहार और समाज की प्रतिक्रिया

हरीश की मां ने कोर्ट में कहा था, “मैं अपने बेटे को इस स्थिति में नहीं देख सकती। मैंने उसकी जिन्दगी को जीते जी मरते हुए देखा है। मैं चाहती हूँ कि उसे शांति मिले।” इस बयान ने न केवल न्यायालय को प्रभावित किया, बल्कि समाज में भी इस विषय पर चर्चा को जन्म दिया। कई विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में परिवार की भावनाओं को समझना आवश्यक है।

समाज पर प्रभाव

इस निर्णय का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। लोगों को यह समझने में मदद मिलेगी कि जीवन और मृत्यु के बीच का यह जटिल संबंध केवल कानूनी नहीं, बल्कि मानवता का भी विषय है। इससे अन्य परिवारों को भी इस तरह के मामलों में निर्णय लेने में मदद मिलेगी।

विशेषज्ञों की राय

मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ. सीमा वर्मा ने कहा, “यह फैसला महत्वपूर्ण है क्यूंकि यह उन लोगों के लिए एक नजीर है जो लंबे समय तक पीड़ा सहन कर रहे हैं। हमें यह समझना होगा कि कभी-कभी मृत्यु ही शांति का रास्ता हो सकती है।”

आगे क्या होगा?

अब सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद, यह देखना होगा कि अन्य राज्य न्यायालय इस तरह के मामलों में क्या निर्णय लेते हैं। इसके अलावा, सरकार को इस विषय पर कानून बनाने पर भी विचार करना चाहिए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि ऐसे मामलों में पारदर्शिता और मानवता बनी रहे।

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