13 साल तक कोमा में रहने के बाद हरीश राणा का AIIMS में निधन, सुप्रीम कोर्ट ने दी थी Passive Euthanasia की अनुमति

नई दिल्ली: 13 साल से कोमा में रहने के बाद 28 वर्षीय हरीश राणा का निधन अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में हो गया। यह मामला पिछले कुछ वर्षों से सुर्खियों में रहा, जब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें पेसिव यूथेनाजिया की अनुमति दी थी। हरीश का परिवार लंबे समय से उनकी स्थिति को लेकर संघर्ष कर रहा था और न्यायपालिका द्वारा दिए गए निर्णय ने उनके लिए एक नई उम्मीद जगाई थी।
क्या हुआ था?
हरीश राणा, जो उत्तराखंड के एक छोटे से गांव के निवासी थे, 13 साल पहले एक सड़क दुर्घटना के बाद कोमा में चले गए थे। उनका इलाज कई अस्पतालों में किया गया, लेकिन उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। उनके परिवार ने वर्षों तक उनकी देखभाल की, लेकिन अंततः उन्हें इस बात का सामना करना पड़ा कि हरीश की हालत स्थायी हो चुकी है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पेसिव यूथेनाजिया की अनुमति दी, जिससे हरीश के परिवार को उम्मीद थी कि शायद वह अब अपनी पीड़ा से मुक्त हो सकेंगे। यह निर्णय भारतीय न्यायपालिका के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ, क्योंकि इससे पहले ऐसा कोई फैसला नहीं लिया गया था। कोर्ट ने कहा था कि अगर किसी व्यक्ति की चिकित्सा स्थिति गंभीर हो और वह कोमा में हो, तो उसके जीवन को खत्म करने का निर्णय उसके परिवार के सदस्यों पर छोड़ दिया जाना चाहिए।
आम लोगों पर असर
हरिश राणा के मामले ने समाज में पेसिव यूथेनाजिया पर चर्चा को बढ़ावा दिया है। यह मामला उन लोगों के लिए एक उदाहरण बन गया है जो गंभीर चिकित्सा स्थितियों से गुजर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से और अधिक परिवारों को अपने प्रियजनों की स्थिति पर विचार करने का अवसर मिलेगा।
विशेषज्ञों की राय
मनोचिकित्सक डॉ. सुमित शर्मा ने कहा, “इस मामले ने यह प्रदर्शित किया है कि हमें जीवन और मृत्यु के बारे में सोचने की आवश्यकता है। ऐसे मामलों में, परिवार को निर्णय लेने की शक्ति देनी चाहिए। यह पहली बार है जब भारतीय न्यायालय ने इस प्रकार के मामले पर विचार किया है।”
भविष्य की संभावनाएँ
इस मामले के बाद, उम्मीद की जा रही है कि पेसिव यूथेनाजिया पर और अधिक चर्चाएँ होंगी और शायद सरकार इस दिशा में कोई कानून बनाने पर विचार करेगी। हालांकि, यह भी ध्यान में रखना होगा कि इस प्रकार के निर्णय परिवारों पर भारी मानसिक दबाव डाल सकते हैं।
हरिश राणा का निधन न केवल उनके परिवार के लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए एक महत्वपूर्ण घटना है। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमें जीवन और मृत्यु के अधिकार पर विचार करने की आवश्यकता नहीं है।



