तिरुपति बालाजी के 10 रहस्य, हर गुरुवार दिखता है यह चमत्कार

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तिरुपति बालाजी के 10 रहस्य, हर गुरुवार दिखता है यह चमत्कार

Tirupati Balaji मंदिर भारत में हिंदू धर्म के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक है. तिरुपति बालाजी मंदिर आंध्र प्रदेश में तिरुमला की पहाड़ियों पर स्थित है. भगवान तिरुपति के दरबार में गरीब और अमीर दोनों सच्‍चे श्रद्धाभाव के साथ अपना सिर झुकाते हैं. हर साल लाखों लोग तिरुपति बालाजी के मंदिर में भगवान वेंकटेश्‍वर का आशीर्वाद लेने के लिए एकत्र होते हैं. ऐसी मान्यता हैं कि है कि भगवान बालाजी अपनी पत्‍नी पद्मावती के साथ तिरुमला में निवास करते हैं. ऐसी मान्‍यता है कि जो भक्‍त सच्‍चे मन से भगवान के सामने प्रार्थना करते हैं, बालाजी उनकी सभी मुरादें पूरी करते हैं. मनोकामना पूरी होने पर भक्‍त अपनी श्रद्धा के अनुसार यहां आकर तिरुपति मंदिर में अपने बाल दान करते हैं. इस अलौकिक और चमत्‍कारिक मंदिर से ऐसे रहस्‍य जुड़े हैं, जिन्‍हें जानकर आप भी दंग रह जाएंगे. तो आइये जानते हैं.

Why Tirupati Balaji is so famous?

अद्भुत छड़ी
मंदिर में मुख्‍य द्वार पर दरवाजे के दाईं ओर एक छड़ी है। इस छड़ी के बारे में कहा जाता है कि बाल्‍यावस्‍था में इस छड़ी से ही भगवान बालाजी की पिटाई की गई थी, इस कारण उनकी ठुड्डी पर चोट लग गई थी. इस कारणवश तब से आज तक उनकी ठुड्डी पर शुक्रवार को चंदन का लेप लगाया जाता है. ताकि उनका घाव भर जाए.

एक दशक से भी ज्यादा समय लगा हैं मंदिर को बनाने में

इस मंदिर को “टेम्पल ऑफ़ सेवन हिल्स ” भी कहा जाता है. तिरुमाला गाव 10.33. वर्ग मीटर (26.75 किलोमीटर वर्ग) के क्षेत्र में बसा हुआ है. इस मंदिर को द्रविड़ियन आर्किटेक्चर में बनाया गया है और लोगो का मानना है की इसे एक दशक से भी ज्यादा के समय में बनाया गया था जिसकी शुरुवात 300 AD में हुई थी. गर्भगृह को अनंदा निलयम भी कहा जाता है.

विश्व का सबसे धनवान मंदिर World’s richest temple

तिरुपति बालाजी मंदिर / Tirupati Balaji Temple विश्व का सबसे समृद्ध और धनवान मंदिर है, जहाँ भक्तगण करोडो रुपयों का दान देते है. रोज़ तक़रीबन एक लाख तीर्थयात्री मंदिर के दर्शन करने आते है, विशेष रूप से त्यौहार और फेस्टिवल के समय यह संख्या 5 लाख से भी उपर की हो जाती है. तिरुपति बालाजी मंदिर को विश्व का सबसे प्रसिद्ध स्थान माना जाता है.

कुण्ड का महत्व

श्रद्धालु ख़ासकर इस कुण्ड के पवित्र जल में डुबकी लगाते हैं. माना जाता है कि वैकुण्ठ में विष्णु इसी कुण्ड में स्नान किया करते थे. यह भी माना जाता है कि जो भी इसमें स्नान कर ले, उसके सारे पाप धुल जाते हैं और सभी सुख प्राप्त होते हैं. बिना यहाँ डुबकी लगाए कोई भी मन्दिर में प्रवेश नहीं कर सकता है. डुबकी लगाने से शरीर और आत्मा पूरी तरह से पवित्र हो जाते हैं.

तिरुपति बालाजी के 10 रहस्य 10 Mysteries of Tirupati Balaji

  1. मुख्यद्वार के दाएं और बालाजी के सिर पर अनंताळवारजी के द्वारा मारे गए निशान हैं. बालरूप में बालाजी को ठोड़ी से रक्त आया था, उसी समय से बालाजी के ठोड़ी पर चंदन लगाने की प्रथा शुरू हुई.
  2. भगवान बालाजी के सिर पर आज भी रेशमी बाल हैं और उनमें उलझने नहीं आती और वह हमेशा ताजा लगते है.
  3. मंदिर से 23 किलोमीटर दूर एक गांव है, उस गांव में बाहरी व्यक्ति का प्रवेश निषेध है। वहां पर लोग नियम से रहते हैं. वहां की महिलाएं ब्लाउज नहीं पहनती. वहीं से लाए गए फूल भगवान को चढ़ाए जाते हैं और वहीं की ही अन्य वस्तुओं को चढाया जाता है जैसे- दूध, घी, माखन आदि.
  4. भगवान बालाजी गर्भगृह के मध्य भाग में खड़े दिखते हैं मगर वे दाई तरफ के कोने में खड़े हैं बाहर से देखने पर ऎसा लगता है.
  5. गृभगृह में चढ़ाई गई किसी वस्तु को बाहर नहीं लाया जाता, बालाजी के पीछे एक जलकुंड है उन्हें वहीं पीछे देखे बिना उनका विसर्जन किया जाता है.
  6. बालाजी की पीठ को जितनी बार भी साफ करो, वहां गीलापन रहता ही है, वहां पर कान लगाने पर समुद्र घोष सुनाई देता है.
  7. बालाजी के वक्षस्थल पर लक्ष्मीजी निवास करती हैं. हर गुरुवार को निजरूप दर्शन के समय भगवान बालाजी की चंदन से सजावट की जाती है उस चंदन को निकालने पर लक्ष्मीजी की छबि उस पर उतर आती है। बाद में उसे बेचा जाता है.
  8. बालाजी के जलकुंड में विसर्जित वस्तुए तिरूपति से 20 किलोमीटर दूर वेरपेडु में बाहर आती हैं.
  9. गर्भगृह मे जलने वाले चिराग कभी बुझते नही हैं, वे कितने ही हजार सालों से जल रहे हैं किसी को पता भी नही है.
  10. बताया जाता है सन् 1800 में मंदिर परिसर को 12 साल के लिए बंद किया गया था. किसी एक राजा ने 12 लोगों को मारकर दीवार पर लटकाया था उस समय विमान में वेंकटेश्वर प्रकट हुए थे ऎसा माना जाता है.

तिरुपति बालाजी की कथा Tirupati Balaji Story In Hindi

एक बार भृगु ऋषि ने जानना चाहा कि ब्रह्मा ,विष्णु और महेश में कौन सबसे श्रेष्ठ है ? वह बारी-बारी से सबके पास गये. ब्रह्मा और महेश ने भृगु को पहचाना तक नही , न ही आदर किया. इसके बाद भृगु विष्णु के यहा गये. विष्णु भगवान विश्राम कर रहे थे और माता लक्ष्मी उनके पैर दबा रही थी. भृगु ने पहुचते ही न कुछ कहा , न सुना और भगवान विष्णु की छाती पर पैर से प्रहार कर दिया. लक्ष्मी जी यह सब देखकर चकित रह गयी किन्तु विष्णु भगवान ने भृगु का पैर पकडकर विनीत भाव से कहा ” मुनिवर ! आपके कोमल पैर में चोट लगी होगी. इसके लिए क्षमा करे.

लक्ष्मी जी को भगवान विष्णु की इस विन्रमता पर बड़ा क्रोध आया. वह भगवान विष्णु से नाराज होकर भू-लोक में आ गयी तथा कोल्हापुर में रहने लगी. लक्ष्मी जी के चले जाने से विष्णु भगवान को लगा कि उनका श्री और वैभव ही नष्ट हो गया और उनका मन बड़ा अशांत रहने लगा. लक्ष्मी जी को ढूढने के लिए वह श्रीनिवास के नाम से भू-लोक आये. घूमते घुमाते वेंकटचल पर्वत क्षेत्र में बकुलामाई के आश्रम में पहुचे. बकुलामाई ने उनकी बड़ी आवाभगत की. उन्हें आश्रम में ही रहने को कहा.

एक दिन जंगल में एक मतवाला हाथी आ गया. आश्रमवासी डरकर इधर उधर भागने लगे. श्री निवास ने यह देखा तो धनुष बाण लेकर हाथी का पीछा किया. हाथी डरकर भागा और घने जंगल में अदृश्य हो गया. श्री निवास उसका पीछा करते करते थक गये थे. वह एक सरोवर के किनारे वृक्ष की छाया में लेट गये और उन्हें हल्की सी झपकी आ गयी. थोड़ी देर में शोर सुनकर वह जागे तो देखा कि चार -छ युवतिया उन्हें घेरे खडी है. श्रीनिवास को जागा हुआ देखकर वे डपटकर बोली “यह हमारी राजकुमारी पद्मावती का सुरक्षित उपवन है और यहा पुरुषो का आना मना है. तुम यहा कैसे और क्यों आये हो.

श्रीनिवास कुछ जवाब दे इससे पहले ही उनकी दृष्टी वृक्ष की ओट से झांकती राजकुमारी की ओर गयी. श्रीनिवास पद्मावती को एकटक देखते रह गये. थोडा संयत होकर कहा “देवियों ! मुझे पता नही था , मै शिकार का पीछा करता हुआ यहाँ आया था. थक जाने पर मुझे नींद आ गयी इसलिए क्षमा करे. श्रीनिवास आश्रम में तो लौट आये किन्तु बड़े उदास रहने लगे. एक दिन बकुलामाई ने बड़े प्यार से उनकी उदासी का कारण पूछा तो श्रीनिवास ने पद्मावती से भेंट होने की सारी कहानी कह सुनाई फिर कहा “उसके बिना मै नही रह सकता “

बकुलामाई बोली “ऐसा सपना मत देखो. कहा वह प्रतापी चोल नरेश आकाशराज की बेटी और कहा तुम आश्रम में पलने वाले एक कुल गोत्रहीन युवक”. श्रीनिवास बोले “माँ ! एक उपाय है तुम मेरा साथ दो तो सब सम्भव है “. बकुलामाई ने श्रीनिवास का सच्चा प्यार देखकर हा कर दी. श्रीनिवास ज्योतिष जानने वाली औरत का वेश बनाकर राजा आकाश की राजधानी नारायणपुर पहुचे. उसकी चर्चा सुन पद्मावती ने भी उस औरत को महल बुलाकर अपना हाथ दिखाया.

राजकुमारी के हस्त रेखा देखकर वह बोली “राजकुमारी ! कुछ दिन पहले तुम्हारी भेंट तुम्हारे सुरक्षित उद्यान में किसी युवक से हुयी थी. तुम दोनों की दृष्टि मिली थी. उसी युवक से तुम्हारी शादी का योग बनता है”.

पद्मावती की माँ धरणा देवी ने पूछा “यह कैसे हो सकता है ?”

ज्योतिषी औरत बोली “ऐसा ही योग है. ग्रह कहते है कोई औरत अपने बेटे के लिए आपकी बेटी मांगने स्वयं आयेगी ”

दो दिन बाद सचमुच ही बकुलामाई एक तपस्विनी के वेश में राजमहल आयी. उसने अपने युवा बेटे के साथ पद्मावती के विवाह की चर्चा की. राजा आकाश में बकुलामाई को पहचान लिया. उन्होंने पूछा “वह युवक है कौन ? ”

बकुलामाई बोली “उसका नाम श्री निवास है. वह चन्द्र वंश में पैदा हुआ है. मेरे आश्रम में रह रहा है. मुझे माँ की तरह मानता है ”

राजा आकाश ने कुछ सोचकर उत्तर देने के लिए कहा. बकुलामाई के चले जाने पर आकाश ने राज पुरोहित को बुलाकर सारी बात बताई. राज पुरोहित ने गणना की. फिर सहमति देते हुए कहा ” महाराज ! श्रीनिवास में विष्णु जैसा देवगुण है लक्ष्मी जैसी आपकी बेटी के लिए यह बड़ा सुयोग्य है ”

राजा आकाश ने तुरंत बकुलामाई के यहा अपनी स्वीकृति के साथ विवाह की लग्न पत्रिका भेज दी. बकुलामाई ने सुना तो वह चिंतित हो उठी. श्री निवास से बोली “बेटा ! अब तक तो विवाह की ही चिंता थी. अब पैसे न होने की चिंता है | मै वराहस्वामी के पास जाती हैं. उनसे पूछती है कि क्या किया जाए ?”

बकुलामाई श्रीनिवास को लेकर वराह्स्वमी के पास गयी और श्रीनिवास के विवाह के लिए धन की समस्या बताई तो वराह स्वामी ने आठो दिग्पालो ,इंद्र ,कुबेर ,ब्रह्मा , शंकर आदि देवताओ को अपने आश्रम में बुलवाया और फिर श्रीनिवास को बुलाकर कहा “तुम स्वयम इन्हे अपनी समस्या बताओ ”

श्रीनिवास ने देवताओ से कहा “मै चोल नरेश राजा आकाश की बेटी पद्मावती से विवाह करना चाहता हैं मेरी हैसियत राजा के अनुरूप नही है मेरे पास धन नही है , मै क्या करू ?”

इंद्र ने कुबेर से कहा “कुबेर ! इस काम के लिए तुम श्रीनिवासन को ऋण दे दो ”
कुबेर ने कहा “ऋण तो दे दूंगा पर उसे यह वापस कब और कैसे करेंगे , इसका निर्णय होना चाहिये ?”

श्रीनिवास बोले “इसकी चिंता मत कीजिये. कलियुग के अंत तक मै सब ऋण चूका दूंगा ”

कुबेर ने स्वीकार कर लिया. सब देवताओ की साक्षी में श्रीनिवास के ऋण पत्र लिख दिया. उस धन से श्री निवास और पद्मावती का विवाह बड़ी धूमधाम से हुआ. तभी नारद ने कोल्हापुर जाकर लक्ष्मी को बताया “विष्णु ने श्रीनिवास के रूप में पद्मावती से विवाह कर लिया है. दोनों वेंकटाचलम् पर्वत पर रह रहे है”

यह सुनकर लक्ष्मी जी को बड़ा दुःख हुआ. वह सीधे वेंकटाचलम पहुची. विष्णु जी की सेवाम एम् लगी पद्मावती को भला बुरा कहने लगी “श्रीनिवास ! विष्णु रूप मेरे पति है |तूने इनके साथ विवाह क्यों किया ?”

दोनों ने वाक् युद्ध होने लगा तो श्री निवास को बड़ा दुःख हुआ. वे पीछे हटे और पत्थर की मूर्ति के रूप में बदल गये. जब दोनों देवियों ने यह देखा तो उन्हें बड़ा दुःख हुआ कि श्रीनिवास तो अब किसी के न रहे.

इतने में शिला विग्रह से आवाज आयी “देवियों मै इस स्थान पर वेंकटेश्वर स्वामी के नाम से , अपने भक्तो का अभीष्ट पूरा करता रहूँगा. उनसे प्राप्त चढावे के धन द्वारा कुबेर के कर्ज का ब्याज चुकाता रहूँगा इसलिए तुम दोनों मेरे लिए आपस में झगड़ा मत करो ”
यह वाणी सुनते ही लक्ष्मी जी और पद्मावती दोनों ने सिर झुका लिया. लक्ष्मी कोल्हापुर आकर महालक्ष्मी के रूप में प्रतिष्टित हो गयी और पद्मावती तिरुनाचुर में शिला विग्रह हो गयी. आज भी तिरुपति क्षेत्र में तिरुमला पहाडी पर भगवान वेंकटेश्वर स्वामी के दर्शन हेतु भक्तगणों से इसी भाव से शुल्क लिया जाता है. उनकी पूजा पुष्प मिष्टान आदि से न होकर धन द्रव्य से होती है. इसी धन से भगवान श्री कृष्ण वेंकटेश्वर स्वामी कुबेर का कर्ज चूका रहे है.

तिरुपति बालाजी कैसे पहुंचे How can I reach Tirupati Balaji?

तिरुपति मंदिर, विजयवाडा से 435 किलोमीटर दूर है, हैदराबाद से 571.9 किलोमीटर , चेन्नई से 138 किलोमीटर, बंगलौर से 291 किलोमीटर और विशाखापत्तनम से 781.2 किलोमीटर दुरी पर स्थित है. इन स्थानों से आप बस या ट्रेन द्वारा पहुँच सकते हैं.

तिरुपति बालाजी त्यौहार – Tirupati Balaji festival

तिरुमाला श्री वेंकटेश्वर मंदिर में साल में कुल 433 त्यौहार मनाये जाते है, साल में 365 दिन होने के बावजूद यहाँ 433 त्यौहार मनाये जाते है, जिसे “नित्य कल्याणं पच्चा तोरणं” का नाम दिया गया है, यहाँ हर दिन त्यौहार ही होता है. यहाँ श्री वेंकटेश्वर ब्रह्मोत्सव का आयोजन भी किया जाता है, जो 9 दिनों तक चलता है, इस उत्सव को प्रतिवर्ष अक्टूबर के महीने में मनाया जाता है, इस उत्सव को श्री वेंकटेश्वर मंदिर का मुख्य उत्सव माना जाता है. ब्रह्मोत्सव के समय मलायाप्पा भगवानो की यात्रा श्री देवी और भू देवी के साथ निकाली जाती है और अलग-अलग वहनं में ले जाया जाता है.

Tirupati Balaji Darshan

तिरुपति बालाजी के दर्शन करने के लिए आपको टिकट लेनी होती हैं. टिकट का मूल्य 300 रूपये है. दर्शन के लिए आप यह टिकट ऑनलाइन भी खरीद सकते हैं. दर्शन करने का समय सुबह 10 से शाम 4 बजे तक हैं.

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